मेरी कलम से

Friday, July 22, 2011

जब भी होता है तेरा जिक्र


जब भी होता है तेरा जिक्र कहीं बातों में
लगे जुगनू से चमकते हैं सियाह रातों में
खूब हालात के सूरज ने तपाया मुझको
चैन पाया है तेरी याद की बरसातों में
रूबरू होके हक़ीक़त से मिलाओ आँखें
खो ना जाना कहीं जज़्बात की बारातों में
झूठ के सर पे कभी ताज सजाकर देखो
सच ओ ईमान को पाओगे हवालातों में
आज के दौर के इंसान की तारीफ़ करो
जो जिया करता है बिगड़े हुए हालातों में
आप दुश्मन क्यों तलाशें कहीं बाहर जाकर
सारे मौजूद जब अपने ही रिश्ते नातों में
सबसे दिलचस्प घड़ी पहले मिलन की होती
फिर तो दोहराव है बाकी की मुलाक़ातों में
गीत भँवरों के सुनो किससे कहूँ मैं 
जिसको देखूँ वो है मशगूल बही खातों में

Wednesday, July 20, 2011

आंशु भर आते है आँखों में

आंशु भर आते है आँखों में हर एक हंसी के बाद !
गम बन गया नसीब मेरा हर ख़ुशी के बाद !! 
निकला था कारवा मोहब्बत की राह में !
हर मोड़ पे नफरत खडी थी हर गली के बाद !!
सोचा था प्यार का मैं संजोउगा गुलशन ! 
हर फूल जल गया मेरा बनकर कली के बाद !!
चाहत की बेबसी का ये कैसा हैं इम्तिहान !
दिल ने ना सकू पाया कभी दिल लगाने के बाद !! 
अब राख़ ही समेटता हूँ आशियाने की ! 
खुद ही जला दी थी जिसे आजादी के बाद !!
सुनते है बाद मरने के मिलता है सब सिला ! 
देखेगे क्या मिलेगा मुझे जिन्दगी के बाद !!

Tuesday, July 19, 2011

तन्हाई में मेरी

तन्हाई में मेरी मुस्कुराती है तू
ख्वाब में मेरे आती है तू
ओस की बूंद की तरह
जिस्म पे गिर दिल से गुजर जाती है तू
जब तन्हाई में मेरी मुस्कुराती है तू...

हर शाम तुझको सजाता हूं मैं
आंखों में नमी की तरह
होठों पे शबनम की तरह
जब याद आती है तू
तन्हाई में मेरी मुस्कुराती है तू

Saturday, July 16, 2011

एक लड़की मुझे सताती है

अंधेरी-सी रात में एक खिड़की डगमगाती है
सच बताऊँ यारों तो, एक लड़की मुझे सताती है।
भोली भाली सूरत उसकी मखमली-सी पलकें है
हल्की इस रोशनी में, मुझे देख शर्माती है
सच बताऊँ यारों तो इक लड़की मुझे सताती है
बिखरी-बिखरी ज़ुल्फ़ें उसकी शायद घटा बुलाती है,
उसके आँखों के काजल से बारिश भी हो जाती है
दूर खड़ी वो खिड़की पर मुझे देख मुसकुराती है।
सच बताऊँ यारों तो इक लड़की मुझे सताती है
उसकी पायल की छम-छम से एक मदहोशी-सी छा जाती है
ज्यों की आंख बंद करूँ मैं तो, सामने वो जाती है
सच बताऊँ यारों तो इक लड़की मुझे सताती है
ज्यों ही आँख खोलता हूँ मैं तो ख़्वाब वो बन जाती है
अंधेरी-सी रात में एक खिड़की डगमगाती है
रोज़ रात को इसी तरह इक लड़की मुझे सताती है

Thursday, July 7, 2011

तेरे लिए

लिखी है ये गजल सिर्फ तेरे लिए
दीवाना बना भी तो सिर्फ तेरे लिए
किसी को नहीं देखेंगी ये निगाहे 
नज़र तरसेगी भी तो सिर्फ तेरे लिए
हर साँस में याद करूँगा तुझे 
साँस निकलेगी भी तो सिर्फ तेरे लिए
हर प्यार से प्यारी लगती हो तुम मुझे
मैंने प्यार सिखा भी तो सिर्फ तेरे लिए
जब भी बारिश हुई तो तेरी याद आई
और बारिश में मैं भीगा भी तो सिर्फ तेरे लिए
हंसी तो कब की मेरे लबो से रूट गयी
मगर जिस रोज भी हंसा तो वो हंसी भी होगी सिर्फ तेरे लिए
लिखी है ये गजल सिर्फ तेरे लिए
दीवाना बना भी तो सिर्फ तेरे लिए
विकास गर्ग