मेरी कलम से

Wednesday, September 28, 2011

जिंदगी बदल रही है..

*जिंदगी बदल रही है.. *
शायद ज़िन्दगी बदल रही है !!
 जब मैं छोटा था , शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी ..मुझे याद है मेरे घर से स्कूल तक का वो रास्ता , क्या क्या नहीं था वहां , चाट के ठेले, जलेबी की दुकान , बर्फ के गोले , सब कुछ ,
अब वहां मोबाइल शॉप, विडियो पार्लर हैं, फिर भी सब सूना है .. शायद अब दुनिया सिमट रही है ... 
जब मैं छोटा था , शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी. मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे , घंटो उडा करता था, वो लम्बी साइकिल रेस वो बचपन के खेल, वो हर शाम थक के चूर हो जाना, अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है..
जब मैं छोटा था , शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी ,दिन भर वो हुज़ोम बनाकर खेलना, वो दोस्तों के घर का खाना , वो लड़कियों की बातें, वो साथ रोना,
अब भी मेरे कई दोस्त हैं ,पर दोस्ती जाने कहाँ है , जब भी ट्रेफिक सिग्नल पे मिलते हैं हाई करतेहैं, और अपने अपने रास्ते चल देते हैं ,होली , दिवाली , जन्मदिन , नए साल पर बस SMS आ जाते हैं
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं ..
जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे, छुपन छुपाई , लंगडी टांग , पोषम पा, टिप्पी टीपी टाप. अब इन्टरनेट, ऑफिस, हिल्म्स, से फुर्सत ही नहीं मिलती .. 
शायद ज़िन्दगी बदल रही है .
जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है.. जो अक्सर कबरिस्तान के बाहर बोर्ड पर लिखा होता है.
"मंजिल तो यही थी, बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी यहाँ आते आते"
जिंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है.कल की कोई बुनियाद नहीं हैऔर आने वाला कल सिर्फ सपने मैं ही हैं. अब बच गए इस पल मैं ..तमन्नाओ से भरे इस जिंदगी मैं हम सिर्फ भाग रहे हैं ..
इस जिंदगी को जियो न की काटो !!! 
आपकी शाम हमेशा  क़ी तरह सुहावनी हो........विकास गर्ग 

Thursday, September 22, 2011

उससे कह दो मुझे सताना छोड़ दे


उससे कह दो मुझे सताना छोड़ दे
दूसरो के साथ रहकर मुझे जलाना छोड़ दे ,
या तो कर दे इंकार मुझसे मोहब्बत नहीं
या गुजरते हुए देख मुझे पलटकर मुस्कराना छोड़ दे,
ना कर मुझसे बात कोई गम नहीं है
यू सुन कर मेरी आवाज़ खिड़की पे आना छोड़ दे,
कर दे दिल-ऐ-बयां जो छुपा रखा है
यू इशारो में हाल बताना छोड़ दे,
क्या इरादा है अब बता दे मुझे
यू दोस्तों को मेरे किस्से सुनना छोड़ दे,
है पसंद जो रंग मुझे उसे पहना ना करे 
या उस  लिबास में बार - बार मेरे सामने आना छोड़ दे,
ना कर याद मुझे बेशक तू पर 
किताबो पे नाम लिख कर मेरा उसे  मिटाना छोड़ दे,
अब या तो तू मेरा हो जा 
या सब से मुझे अपना बताना छोड़ दे,

Thursday, September 8, 2011

वो क्या जाने

इन्तहा मोहब्बत की वो क्या जाने,
इम्तेहान ग़ुरबत की वो क्या जाने,
जिन्हें काँटों से बचने की आदत हो,
फूलों से चाहत वो क्या जाने,
जो ना रखते हो ज़मीन पर पैर कभी,
कदमो की आहट वो क्या जाने,
बिन मांगे जिसे मिल जाता हो सब कुछ,
कुछ पाने की शिद्धत वो क्या जाने !

Monday, September 5, 2011

रात जुदाई की

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की

कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की

वस्ल की रात न जाने क्यूँ इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की

उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की

Friday, September 2, 2011

एक पगली


एक पगली न जाने क्यू
मुझको देखकर मुस्कुराती थी
जब मैं उसको बुलाता तो
वो जाने क्यू इतराती थी
जब जब मैं उसको देखता तो
मै सोचा करता था
लगता था जैसे उसकी याद मुझे सताती थी
उसको देखना मुझे अच्छा लगता था
और मुझको देखकर वो मुसकराती थी
मै जब उससे कहता
मै तुमसे प्यार करता हूँ
फिर वो मुझको पागल बताती थी
जब कभी मै उदास हो जाया करता था
आकर मेरे पास मुझे खूब हंसाती थी
जब मै उसकी चोटी खीचा करता था
कुछ देर के लिए वो रूठ जाती थी
प्यार की बाते समझी जब वो
मुझको अपना खुदा बताती थी
छोडकर ना जाना तुम मुझको
साथ जीने मरने की कसमे खाती थी
साथ जीने मरने की कसमे खाती थी

एक पगली न जाने क्यू
मुझको देखकर मुस्कुराती थी